BY---ANAND RAI...
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मधेशी चाहें मोदी का दखल
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हाइलाइटर
नेपाल में भारत से जाने वाली खाद्य सामग्री, डीजल, पेट्रोल और घरेलू गैस की आपूर्ति नहीं हो पा रही है। महाराजगंज जिले के सम्पतिहा से सोनौली तक करीब 16 किलोमीटर तक माल लदे ट्रकों की कतार बन गयी है। नेपाल में पेट्रोल तीन सौ से चार सौ रुपये लीटर बिक रहा है जबकि नेपाली मुद्रा में प्याज दो सौ रुपये किलो बिक रही है।
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-भारत का विरोध बढ़ा पहाड़ के नेपालियों में
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बेलहिया (नेपाल) : नेपाल में नए संविधान के विरोध में मधेशियों के आंदोलन का रंग अब ज्यादा चटख होने लगा है। इस आंदोलन से भारत-नेपाल के व्यापारिक और राजनीतिक रिश्तों में खटास का खतरा भी बढ़ गया है। भारतीयों से रोटी-बेटी का रिश्ता रखने वाले मधेशी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से इस मामले में सीधा हस्तक्षेप चाहते हैं जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले नेपाली मूल के लोगों को अंदेशा है कि मधेशियों को भारत की ओर से हवा मिल रही है।
मंगलवार को नेपाल के रुपंदेही जिले की बेलहिया चौकी पर यह नजारा साफ देखने को मिला। मधेशियों का एक जत्था जैसे ही धरने पर बैठा, उन पर ईंट-पत्थर चलने लगा। नो मैंस लैंड के इस पार भारतीय सीमा पर मधेशी और नेपाल सीमा पर पहाडिय़ों के बीच करीब बीस मिनट तक जमकर पथराव हुआ। पहाड़ी मूल के नेपाली भारत के विरोध में नारे भी लगा रहे थे जबकि सोनौली की ओर से जवाबी पत्थर फेंकने में कुछ भारतीयों के भी हाथ शामिल थे। अभी कुछ माह पहले नेपाल की भूकंप त्रासदी में भारत सबसे बड़ा मददगार था। तब सर्वाधिक लाभ पहाड़ी इलाकों में रहने वालों ने ही उठाया। त्रासदी से उबर रहे नेपाल के लिये अमन-चैन की जरूरत है लेकिन नस्लभेद में वहां छिड़ी रार उनके विकास की दुश्मन बन गयी है। हालत यह है कि दोनों देशों की सीमाओं पर आवागमन ठप है। पहाड़ी मूल के अमर थापा मानते हैं कि इसका कुप्रभाव पड़ रहा है। लुंबिनी के सांसद कमलेश्वर पुरी कहते हैं कि संविधान संशोधन नहीं हुआ तो हालात और खराब होंगे। जन जीवन अस्त-व्यस्त हो जायेगा।
पहाड़ी मूल के नेपाली भारत पर इसलिये शक कर रहे हैं क्योंकि मधेशियों का रंग, बोली, भाषा, रहन-सहन और रिवाज भारतीयों से मिलते हैं। इस रंग भेद में पहाड़ और मैदान एक दूसरे के खिलाफ तन गये हैं। शायद इसी भावना के चलते मंगलवार को पहाड़ी नेपालियों ने बेलहिया सीमा पर भारत के विरोध में खूब नारे लगाये। मधेशियों को नेपाल के नये संविधान में सात राज्यों के गठन और नागरिकता के लिये बनाये गये नियम-कानून में खोट नजर आ रहा है। इसी के खिलाफ 51 दिनों से उनका आंदोलन निरंतर तेज हो रहा है। भूकंप की त्रासदी से उबर रहे नेपाल के लिये यह आंदोलन किसी बड़े झटके से कम नहीं है। नेपाल के बुद्धिजीवी वर्ग में इसको लेकर चिंता भी देखी है। नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार युवराज घिमिरे कहते हैं कि यह बहुत जटिल मामला है। मधेशियों की कुछ मांग जायज हैं तो कुछ नाजायज क्योंकि उनकी अगुवाई करने वाले सिर्फ सुविधा की राजनीति कर रहे हैं।
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मधेशी मोर्चा लड़ेगा निर्णायक लड़ाई
नए संविधान के खिलाफ नेपाल के तराई इलाकों में सक्रिय राजनीतिक दलों ने मोर्चा बनाकर युद्ध छेड़ दिया है। संघीय लोकतांत्रिक मधेशी मोर्चा के बैनर तले तराई मधेश लोक तांत्रिक पार्टी के अध्यक्ष महंथ ठाकुर, उपाध्यक्ष हृदयेश त्रिपाठी, संघीय समाजवादी फोरम नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव, सद्भावना पार्टी के राजेन्द्र महतो और तराई मधेश सद्भावना पार्टी के महेन्द्र राय यादव इस लड़ाई की अगुवाई कर रहे हैं। नेपाल के पूर्व मंत्री हृदयेश त्रिपाठी और मोर्चा संयोजक महेन्द्र यादव कहते हैं कि मोदी जी को इसमें हस्तक्षेप कर संविधान में परिवर्तन के लिये सीधी पहल करनी चाहिये। उनका कहना है कि हम संविधान में बदलाव तक अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।
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मधेशी साम्राज्य 22 जिलों में
नेपाल में तराई के 22 जिलों में मधेशियों का साम्राज्य फैला है। झापा, मोरंग, सुनसारी, परसा, इटहरी, सप्तरी, सिरहा, रौतहट, मोहतरी, धनुषा, बारा, सरलाही, चितवन, नवलपरासी, रुपंदेही, दांग, बांके, बरदिया, कंचनपुर और कैलाली जिलों में रहने वाले सांवले रंग और बिल्कुल भारतीयों की तरह दिखने वालों को मधेशी कहते हैं। नेपाल की करीब पौने तीन करोड़ आबादी में 37 फीसद हिस्सेदारी मधेशियों की है।
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भारतीयों का प्रवेश मुश्किल
आंदोलन का असर यह है कि नेपाल में भारतीयों के प्रवेश पर पहाडिय़ों की ओर से हाथापाई की जा रही है और उनके भारत आने पर इस ओर भी यही हाल है। आंदोलन की चक्की में कारोबारी पिस रहे हैं। दोनों तरफ से आवागमन ठप है। सिर्फ सोनौली बार्डर से प्रतिदिन करीब तीन सौ ट्रक खाद्य सामग्री, डीजल-पेट्रोल और घरेलू गैस आदि लेकर नेपाल जाते थे। हिमाचल प्रदेश से सेबों का ट्रक लेकर चले मुहम्मद नाजिर और शिमला के राजकुमार परेशान हैं। सात दिन में उनका सेब पानी छोडऩे लगा है। इन्हें कोई उपाय नहीं दिख रहा है। आगरा के रामतेज ट्रक मे आलू और राम सकल प्याज लेकर सात दिनों से पड़े हैं। चेन्नई, हरियाणा, दिल्ली समेत कई राज्यों के कारोबारी, ट्रक चालक और कर्मचारी भूख-प्यास से छटपटा रहे हैं पर उनका कोई पुरसाहाल नहीं है।
---- इनसेट ----
--गांधी की राह पर मधेसी
नए संविधान में वजूद बरकरार रखने के लिए आंदोलित मधेसी अब महात्मा गांधी की राह पकड़ेंगे। गांधी जयंती पर 12 लाख से अधिक मधेसी करीब 1155 किलोमीटर लम्बी मानव श्रंखला बनाकर अपने हक की आवाज सत्याग्रही अंदाज में बुलंद करेंगे। संघीय लोकतांत्रिक मधेसी मोर्चा ने विरोध का अङ्क्षहसक रास्ता अपनाते हुए तराई क्षेत्र के 22 जिलों में गांधीगिरी का संदेश देना शुरू किया है। नेपाल सरकार के पूर्व मंत्री हृदयेश त्रिपाठी का दावा है कि झापा से महाकाली तक बनने वाली मानव श्रंखला में 37 प्रतिशत मधेसियों का प्रतिनिधित्व रहेगा।
गत 51 दिनों से पनपे संविधान विरोधी आंदोलन में तराई क्षेत्र के 22 जिलों का माहौल गर्माया हुआ है। मधेसियों की घनी आबादी वाले झापा, कंचनपुर, कैडलाली, सुनसरी, मोरांग, परसा, ईटहरी, तिरहा, बारा, धनुषा, चितवन, रोहताश, मोहतरही, सरलाई, रूपनदेही, ढांग, बांके, सैलाली व नवल पतसई आदि जिलों में प्रचार- प्रसार जोर पकड़े है।
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30.09.2015
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पिपरहवो हमार, नौतनवों हमार
नोट- स्टोरी के साथ प्रयोग के लिए लोगो 30यूपीडी-जी1 में जारी किया गया है।
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-नेपाल में बदल रहे रिश्तों के समीकरण
-चीन के प्रति मधेशियों में भड़क रहा गुस्सा
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पिपरहवा (नेपाल) : नेपाल के नए संविधान के विरोध में जारी मधेशी आंदोलन से रिश्तों के समीकरण बदल रहे हैं। पहाड़ में रहने वाले नेपालियों का झुकाव चीन की तरफ बढ़ रहा है जबकि तराई में बसने वाले मधेशी भारतीयों से गांठ मजबूत करने लगे हैं। इस कारण नेपाल दो हिस्सों में बंटा दिख रहा है। स्वाभाविक है तीनों देशों पर इसका सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रभाव पडऩा तय है।
नेपाल के रुपनदेही जिले के करीब 130 घरों वाले मधेशी बहुल पिपरहवा गांव के लोगों ने जबसे सुना कि भारत से बहू लाने पर सात साल के इंतजार के बाद उसे नेपाल की नागरिकता मिलेगी, तबसे उनका गुस्सा भड़क गया है। गांव के कक्षा आठ तक पढ़े नगेसर और गोरखनाथ कुर्मी कहते हैं कि हमारे रोटी-बेटी के रिश्तों पर अंकुश लगाने के लिए नागरिकता का नया नियम चीन की साजिश से बनाया गया है। पिपरहवा और आस-पास के गांवों के हर घर में भारतीय परिवारों के बेटे-बेटियों की शादी हुई है। साठ साल पहले नौतनवां के पास के एक गांव से ब्याह कर पिपरहवा गयीं भूला देवी नागरिकता की बात तो नहीं समझतीं लेकिन बड़े दम से कहती हैं कि 'पिपरहवो हमार, नौतनवों हमारÓ। असल में जब भूला का ब्याह हुआ तो उन्हें नेपाल और भारत की जगह सिर्फ इतना पता था कि मायके से कोस भर की दूरी पर ससुराल है, लेकिन बदले हालात में दोनों देशों की दूरी उन्हें समझ में आ गयी है। इसी गांव में 12 वर्ष पहले ब्याही गयी महराजगंज की शर्मिला कहती हैं कि अगर भारत से रिश्तेदारी के लिए नियम कानून बनेंगे तो चल नहीं पायेंगे।
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अगड़ों-पिछड़ों की दूरी कम मधेशी बहुल गांवों में निरक्षर भी नियम कानूनों के प्रभाव-दुष्प्रभाव से वाकिफ होने लगे हैं। पिपरहवा से एक मील के हेरफेर में ठरका, भिलरहवा, बैरिहवां, ठरकी, हड़सरी और नौडिहवा जैसे गांवों में कुर्मी, धोबी, मुसलमान, अनुसूचित जाति, यादव, ब्राह्मण और कुछ क्षत्रिय बसे हैं। कुछ वर्ष पहले यह इलाका माओवादी आंदोलन से प्रभावित था। तब अगड़ी और पिछड़ी जातियों के बीच दूरी थी लेकिन वह दीवार अब गिर गयी है। इन सभी को लगता है कि माओवादी आंदोलन भी चीन की साजिश से ही भड़का। माओवादी आंदोलन के दौरान इन गांवों से ज्यादातर सवर्णों ने पलायन कर उत्तर प्रदेश के महराजगंज और गोरखपुर जिलों में ठौर-ठिकाना बनाया जबकि पिछड़ी जाति के लोग गांवों में ही रह गये। उप्र की सीमा पर तैनात सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) गांवों में रहने वाले मधेशियों को तब शक की निगाहों से घूरता था। अब एसएसबी का रुख नरम है।
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नई राह बना रहे मधेशी
नौतनवां से करीब दो किलोमीटर आगे पहाड़ों से निकली डंडा नदी बहती है। यह नदी भारत-नेपाल की सरहद तय करती है। धीमे बहाव वाली नदी में घुटनों तक पानी के बीच उस पार जाने को कई गांव वाले आते-जाते मिले। माओवादी आंदोलन के दौरान एसएसबी ने इस नदी से बांस का पुल हटवा दिया था। तबसे गांव वाले नदी पारकर भारत की सीमा में व्यापार व दवा के लिए आते हैं। यहां वाहन ले जाने पर रोक है। बनगाई से मर्चवार क्षेत्र होते हुए करीब 35 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद वाहन लेकर पिपरहवा जाया जा सकता है लेकिन मधेशियों के प्रति एसएसबी का रुख नरम होने से गांव वालों का उत्साह बढ़ा है। नतीजा है कि डंडा नदी पर अरसे बाद बांस का पुल बनाने की तैयारी शुरू है। पिपरहवा गांव के रामचंद्र, रामराज, सूरज रामकिशुन, श्याम बिहारी समेत कई लोग बांस-बल्ली जुटाने में लगे हैं।
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शादियों की सियासत में मधेशी भी कम नहीं
नए संविधान में विदेशी महिला से शादी किये जाने पर सात वर्ष बाद नागरिकता दिये जाने के प्रावधान से भले उबाल आ गया है लेकिन नेपाल में शादियों की सियासत में मधेशी भी पीछे नहीं हैं। नये संविधान के विरोध में जिन बड़े मधेशी नेताओं ने मोर्चा खोला है उनमें ज्यादातर नेताओं ने अपनी शादी पहाड़ में की है। आम मधेशी इस बात की चर्चा करना नहीं भूलता कि सुरक्षा और दांव-पेंच के लिए ही इन नेताओं ने पहाड़ में अपनी शादी रचाई। नए संविधान के विरोध में चल रहे आंदोलन में सबसे प्रभावी नाम नेपाल सरकार के पूर्व मंत्री हृदयेश त्रिपाठी का है। त्रिपाठी की शादी पहाड़ी मूल में हुई। इनके अलावा पूर्व मंत्री ओमप्रकाश यादव गुलजारी और मर्चवार क्षेत्र के सांसद सर्वेन्द्र नाथ शुक्ल ने भी पहाड़ी मूल की लड़की से शादी की है। मधेशी आंदोलन में सक्रिय पूर्णमासी और रामचंद्र कहने में संकोच नहीं करते कि हमारे नेता लोग अपनी सुरक्षा और सियासत के लिए दोनों तरफ अपने लाभ का रास्ता बनाते हैं।
(आनंद राय की लेखनी से साभार)
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